फीलगुड़ मौसम आया रे
आतंकी बन गया पड़ोसी दुनिया देख रही थी
अमरीका के आगे दिल्ली घुटने टेक रही थी
जार्ज मिलाते फिरते थे भारत से बुश की राशी
दो दो बार हुई थी इनकी नंगा कर तालाशी
फिर भी यही बताया रे
फील गुड़ मौसम आया रे
सिने तारिकाओ का अब संसद तक जादू फैला
मंत्री जी भी काम छौड कर गाते लैला लैला
देख जया हेमा को जागी बूढे दिल मे आस
दिल्ली वासी बुझा रहे सब रूपसुधा से प्यास
खुली जुल्फों का साया रे
फील गुड़ मौसम आया रे
लोकतंत्र रह गया देश में सिर्फ चुनावी मेला
राजनीती बन गई अखाड़ा संसद बनी तबेला
कुर्ता धोती फटा हुआ और मचा रहे हुड़्दंग
किसकी गलती से दिल्ली तक पहुँच गए जयचन्द
इन्होने देश चबाया रे
फील गुड़ मौसम आया रे
आटा चावल दाल पे जमकर बैठ गई महगांई
छोंक लगाती है पानी से शब्जी में भोजाई
आग लगी है बाजारों मे देश मे हाहा कार
शक्कर गुड़ को चबा गए है घर बैठे मक्कार
कोई कुछ समझ ना पाया रे
फील गुड़ मौसम आया रे
सुभाष मलिक