Tuesday, September 9, 2014

गाँव

बहुत सुंदर बहुत मोहक तुम्हारा शहर है लेकिन
मुझे वह गाँव की गलियां पुरानी याद आती हैं 
चहकते खेत, लहराती हुई फसलें; गरजते घन,
उन्ही के बीचमें फिर झूमता गाता हुआ ये मन 
लिखी जो कलपनाओं पर कहानी याद आती है 
मुझे वह गाँव की गलियां पुरानी याद आती हैं
सुभाष मलिक

Saturday, September 6, 2014

संदेह की दीवार

दुख सारे खुद मिट जाएगें तुम यूं ही मुस्काते रहना | 
दुनिया मधुमय हो जाएगी मधुर कंठ से गाते रहना |
यें संदेह भरी दीवारें टूट के एक दिन गिर जाएगीं ,
कभी कभी तुम भूले से ही गली हमारी आते रहना ||
सुभाष मलिक